Shayari Nida Fazli

चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है!!
ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता!!
मैं भी तू भी यात्री चलती रुकती रेल!!
अपने अपने गाँव तक सब का सब से मेल!!
उस जैसा तो दूसरा मिलना था दुश्वार!!
लेकिन उस की खोज में फैल गया संसार!!
हर घड़ी ख़ुद से उलझना है मुक़द्दर मेरा!!
मैं ही कश्ती हूँ मुझी में है समुंदर मेरा!!
!!Nida Fazli!!
आंगन–आंगन बेटियां!!
छाँटी–बांटी जायें!!
जैसे बालें गेहूँ की!!
पके तो काटी जायें!!
घी मिस्री भी भेज कभी अख़बारों में!!
कई दिनों से चाय है कड़वी या अल्लाह!!
Shayari of Nida Fazli
किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से!!
हर जगह ढूँढता फिरता है मुझे घर मेरा!!
धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो!!
ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो!!
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता!!
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो!!
!!Nida Fazli!!
मैं भी तू भी यात्री चलती रुकती रेल!!
अपने अपने गाँव तक सब का सब से मेल!!
गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम!!
हर क़लमकार की बे-नाम ख़बर के हम हैं !!
खुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को
बदलते वक्त पे कुछ अपना इख्तिकार भी रख
तुम से छूट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था
तुम को ही याद किया तुम को भुलाने के लिए!!