Rahat Indori Shayari on Love

नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं!!
बरसों से ख़्वाब आ आ के!!
मेरी छत पे टहलते क्यूं हैं!!
रोज़ तारों को नुमाइश में खलल पड़ता हैं!!
चाँद पागल हैं अन्धेरें में निकल पड़ता हैं!!
उसकी याद आई हैं सांसों, जरा धीरे चलो!!
धडकनों से भी इबादत में खलल पड़ता हैं!!
अफवाह थी की मेरी तबियत ख़राब हैं!!
लोगो ने पूछ पूछ के बीमार कर दिया!!
अब तो हर गली का पत्थर हमें पहचानता हैं!!
उम्र गुजरी हैं तेरे शहर में आते जाते!!
एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे!!
वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के!!
छू गया जब कभी ख़याल तेरा!!
दिल मेरा देर तक धड़कता रहा!!
कल तेरा जिक्र छिड़ गया था घर में!!
और घर देर तक महकता रहा!!
Rahat Indori Love Shayari
मेरी ख्वाहिश है कि आंगन में न दीवार उठे!!
मेरे भाई, मेरे हिस्से की जमीं तू रख ले!!
कभी दिमाग, कभी दिल, कभी नजर में रहो!!
ये सब तुम्हारे घर हैं, किसी भी घर में रहो!!
हाथ खाली हैं तेरे शहर से जाते जाते!!
जान होती तो मेरी जान लुटाते जाते!!
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है!!
उम्र गुजरी है तेरे शहर में आते जाते!!
इन रातों से अपना रिश्ता जाने कैसा रिश्ता है!!
नींदें कमरों में जागी हैं ख़्वाब छतों पर बिखरे हैं!!
अब ना मैं हूँ, ना बाकी हैं ज़माने मेरे!!
फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे!!
ज़िन्दगी है तो नए ज़ख्म भी लग जाएंगे!!
अब भी बाकी हैं कई दोस्त पुराने मेरे!!